Sunday, March 1, 2026

 जो दिया था सब लुटा दिया, फिर भी अधूरा राह में हूँ

नदियाँ चौड़ी होती रहीं, फिर भी अधूरा राह में हूँ


जिसे थामना था छोड़ दिया, जिसे जाने देना था थाम लिया,

अपनी ही ग़लतफ़हमी का बोझ उठाए, फिर भी अधूरा राह में हूँ


दर्द ने पूछा — क्या तू थका? मैंने कहा — नहीं,

पर क़दम उठते हैं बिना किसी यक़ीन के, फिर भी अधूरा राह में हूँ


वादियाँ गुज़रीं, ऊँचाइयाँ आईं, सफ़र ऊँचा हुआ,

पर भीतर का आदमी वहीं खड़ा रहा, फिर भी अधूरा राह में हूँ


यह घर था, यह ज़िंदगी थी, यह सब अपना था कभी,

अब आईने में अजनबी दिखता है, फिर भी अधूरा राह में हूँ


मनन, राह ने यह राज़ खोला — मंज़िल एक भ्रम है,

भटकना ही वजूद है, फिर भी अधूरा राह में हूँ

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