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Sunday, September 6, 2026

पाकर तुझे, हाय मुझे कुछ होने लगा है

 एक मन था मेरे पास, वो खोने लगा है,

पाकर तुझे, हाय मुझे कुछ होने लगा है,
रातों की नींद आँखों से रूठ सी गई,
दिल को तेरी यादों का रोग लगने लगा है।
ज़माने की कोई बंदिश अब रोक न पाएगी,
मेरा हर रास्ता तेरी तरफ मुड़ने लगा है।
मौसम की पहली बारिश ने आग लगा दी,
इश्क़ का ये रंग मुझपे चढ़ने लगा है।
'मनन' ने छोड़ दी दुनिया की परवाह करना,
सजदा अब बस तेरी चौखट पे होने लगा है।

दूर आपसे अब तो नही रहना है

 कहने की नही बात मगर कहना है,

दूर आपसे अब तो नही रहना है,
ज़ुल्म दुनिया के हँस के सहूँगा मगर,
जुदाई का ये सदमा नही सहना है।
काट दी मैंने आधी उम्र तन्हाई में,
बाक़ी सफ़र बस तेरे साथ कटना है।
शाम ढलते ही यादें घेर लेती हैं,
इन धड़कनों को अब तुझमें ही बहना है।
'मनन' माँगता है बस एक दुआ रब्ब से,
ज़िंदगी भर मुझे तेरा साया बनके रहना है।

चुपचाप तू सहती है क्यूँ

 रुप क्यूँ है दमका, रंग क्यूँ है चमका, साँस तेरी महकी है क्यूँ?

मस्ती जो है बहकी, चुनरी तो है ढलकी, ये चाल तेरी बहकी है क्यूँ?
क्यूँ आग से तू तपे, कुछ तो है तेरे मन में, बात कोई अधूरी सी है
है कैसा नशा छाया, किसने तुझे बहकाया, गिरती सम्हलती है क्यूँ?
मौसम ने क्या छेड़ा, कोई ख़्वाब क्या देखा, होश गँवा बैठी है तू
साए से तू डरे, रह-रह के आहें भरे, धूप में पिघलती है क्यूँ?
आईने के आगे खड़ी, ख़ुद से ही बातें बड़ी, राज़ छुपाती है क्या
दीवाने की चाहत में, या चाहत की राहत में, शम्अ सी जलती है क्यूँ?
'मनन' इस दीवाने को, दिल के आशियाने को, तूने आवाज़ ही न दी
अश्कों की ये रवानी, दर्द की ये कहानी, चुपचाप तू सहती है क्यूँ?

Friday, November 28, 2025

इज़हार न था

सफ़र में कोई भी हमसफ़र इकरार न हुआ,

हम चलते ही रहे पर दिल को करार न हुआ। ।


रास्तों ने हमें आज़माया जाने कितनी दफ़ा,

मगर कहीं भी उम्मीद का कोई दीदार न हुआ। ।


हवा तो थी मगर उड़ानों का ज़रा भी वक़़्त न था,

परों में जोश था लेकिन कोई पैग़ाम न हुआ। ।


हमने उम्रभर चराग़ों की तरह जलना तो सीखा,

पर रोशनियों को हमारी कोई स्वीकार न हुआ। ।


‘मनन’ ने दिल की हर धड़कन में तेरी याद बचाई,

क्या-क्या किया मगर तुझसे कभी इज़हार न हुआ। ।




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On this journey, not even a momentary companion ever came my way;

I kept walking endlessly, yet my heart never found a moment of peace. ।


The roads tested me again and again, in countless ways;

But nowhere did I ever witness even a glimpse of true hope. ।


There was wind, yes—but never the right moment for flight;

My wings had passion, yet no message of destiny arrived. ।


All my life I learned how to burn like a lamp in the dark;

But my light was never welcomed or embraced by anyone. ।


Manan kept your memory alive in every heartbeat;

I did so much—but never found the courage to confess to you. ।

Saturday, November 22, 2025

बुझती–बुझती पुकार की याद

वो बचपना, वो हवाओं में बिखरी महकती-सी रुत-ए-बहार की याद,

हर दिल को रोककर छू ले, वही मासूम-सी बुझती–बुझती पुकार की याद ||


वो दिन कि धूप भी हम पर लोरी-सी गिरती थी सकूँ भर-भर,

हर मोड़ पे मिलती थी ख़्वाबों की वो मासूम सी मुस्कान की याद ||


काग़ज़ के बस्तों में महफ़ूज़ रखा अपना छोटा-सा जहाँ,

हर पन्ने पर खिलता था आने वाले कल का कोई उद्गार की याद ||


साइकिल की साँसों में उड़ता था बचपन का सारा समंदर,

हर मोड़ पे रुककर हमको बुलाती थी वो शहर-ए-गुज़ार की याद ||


मनन कहता है—अब भी रूह में झिलमिल करती है रातों में,

आईनों में चेहरा अपना देख जगाती है कोई नन्हा-सा निखार की याद || 

Wednesday, October 8, 2025

नैन

 मुझे नींद ना आये पिया बिन देखे, अब किसे मिले चैन नैन।

हर घड़ी, हर पल, तेरा रूप बस जाए, जग में बस तेरे नैन।


तेरे आने की आहट पे काँप उठे ये दिल का हर दामन,

कहाँ छुपा रखे हैं तूने वो जादू, जो बसते हैं तेरे नैन।


चाँदनी भी शरमा जाए तेरे गालों की लाली के आगे,

सितारे भी झुक-झुक पूछें, किसके हैं ये मदमस्त नैन।


हवा में तेरी ख़ुशबू का पैघम लहराता है हर मौसम में,

मेरी रूह भी तेरी साँसों से बंधी है, तेरे ही तो हैं ये नैन।


"मनन" कहे, तेरे बिना ये ज़िन्दगी जैसे अधूरी कहानी,

हर जन्म में तुझे ही माँगे, तेरे प्यार भरे वो नैन।

Thursday, September 25, 2025

तेरा नाम लब पे कहते हुए

 चाँदनी रात में आँसू बहते हुए,

सजनी तेरा नाम लब पे कहते हुए।


साँस रुक-रुक के पुकारे तुझको,

दिल धड़कता रहा, जाँ से रहते हुए।


फूल सूखे हैं मुरझाए बाग़ों में,

तेरे क़दमों की आहट सहते हुए।


तेरे जाने से सन्नाटा बोल उठा,

सुरमई शाम ढली थी ढलते हुए।


"मनन" खो गया है तुझमें ही बेख़ुद,

ज़िन्दगी कट रही है भटकते हुए।

Wednesday, September 17, 2025

हो जाती है

हर प्यार की फ़ितरत में बेवफ़ाई हो जाती है।

कुछ दिन रहते हैं, फिर तन्हाई हो जाती है।


जैसे जैसे वक़्त गुज़रता है शाइराना अंदाज़ में,

चुनौती-ए-वफ़ाई की शनासाई हो जाती है।


लम्हों की महफ़िल में यादों की परछाई हो जाती है,

ख़ुशियों के दरमियाँ भी रुसवाई हो जाती है।


सफ़र-ए-इश्क़ में जो भी चलता है बेख़ौफ़,

उसे हर मोड़ पे इक आज़माई हो जाती है।


दिल की खामोशी भी अक्सर चीख़ सी लगती है,

नज़र से नज़र मिले तो सफ़ाई हो जाती है।


ग़म की किताब में लिखे हैं हज़ारों अफ़साने,

मगर हक़ीक़त में बस सच्चाई हो जाती है।


मनन ये दुनिया यूँ ही धोखा नहीं देती,

हर नक़ाब के पीछे रुसवाई हो जाती है।


Monday, September 15, 2025

एहसास नहीं होता

ज़िन्दगी मुश्किलों का भण्डार है यह विश्वास नहीं होता

वर न मरने के बाद जलने तक का एहसास नहीं होता। 


ग़म के पत्थर गिरे तो भी हँसने का इक आभास नहीं होता

दिल के ज़ख़्मों के पीछे ही हरदम तो निराश नहीं होता। 


राह काँटों से भरी है मगर फूल भी खिलते जाते हैं

हर सफ़र में अंधेरे हों तब भी वो बेख़ास नहीं होता। 


हँस के जीना ही असल में जीवन का परिहास है प्यारे

सिर्फ़ रो लेने से कोई दिल का विकास नहीं होता। 


आसमाँ भी कभी ग़म बरसाए तो धूप भी फैलाती है

हर घड़ी रात उतरे तो उसका सन्यास नहीं होता। 


"मनन" कहता है मुस्कुराओ, ग़म को भी साथ लेकर चलना

क्योंकि दुनिया में दुख के सिवा ही तो उपहास नहीं होता। 



வாழ்க்கை எனும் பயணம்

 வாழ்க்கை சொல்லும் கதையெல்லாம் நாளை மறந்திடுமே, வாழ்ந்த தடங்கள் நாமில்லாமல் மண்ணில் மறைந்திடுமே! கல்லாய் கால்கள் கனத்தாலும்  நின்று விடாதே, ...