Thursday, June 26, 2025

बहारों में

इक और फ़लक है, रोशन है सब कुछ यहाँ से —

छोड़ अँधेरे, आबादियों के जहाँ से, बहारों में।


रोशन है इक धूप, नर्म सी बाँहों में छुपी —

भूल के साए, ग़म के हर एक निशान से, बहारों में।


वीरान जंगल, सूखे हुए सब्ज़ रंग भूल जा —

हर शजर है यहाँ गुल से जवाँ से, बहारों में।


सन्नाटा बोलता है उधर, यहाँ गीत है —

सुनता हूँ मैं मधुर मध-मख़ान से, बहारों में।


ख़ामोशियों में भी यहाँ है सुरों का रंग —

फूल बोलते हैं सब ज़बान से, बहारों में।


यहाँ न है कोई सर्द हो के उदासी मिले —

फूल हैं खिलते हर मौसम-ए-अन से, बहारों में।


तू मेरा भाई है, मेरी दुआओं का नूर तू —

खुशबू से भर दे अपनी उड़ान से, बहारों में।


"मनन" के बाग़ में है आबादियों का नशा —

बे-ख़ौफ़ चल के हर इम्तिहान से, बहारों में।

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