Saturday, April 15, 2017

नामुमक़िन है

दिल-ए-नादान को रोखना नामुमक़िन है
ज़क्मी सीने को और ठोकना नामुमकिन है।
दिल के आईने से तुम्हारी तस्वीर ग़ाइब है
टूटे इस शीशे को अब जोड़ना नामुमकिन है।

दर्द-ए-दिल को समझाना नामुमकिन है
टूटकर फिर मुस्कुराना नामुमकिन है।
जब तुम चले जाओ किसीके हाथ थामकर
जहां से लौट आना बिलकुल नामुमकिन है।


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