Monday, December 17, 2018

तुम हो

इस गेहरा समँदर-ए-दिल का किनारा तुम हो 
इन ख्वाब-भरी आँखों का नज़ारा तुम हो

कितना भी कोशिश करूँ तुम्हे भूलने की 
सुबह जब पलक खुलती तो दुबारा तुम हो

गर्दिश-ए-दिल में सितारें कम नहीं - पर 
  मेरी सूनी अफ़क़ में टूटा तारा तुम हो 

तन्हाई में तड़पने की गुंजाइश अब हमें नहीं  
हर सांस में मह्सूस है, अब हमारा तुम हो 



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