Friday, January 4, 2019

हम उछल जाते हैं


तेरे ही याद में मेरे दिन खुल जाते हैं
सारे ग़म-ए-ज़िन्दग़ी यूँ ही फिसल जाते हैं||

दुआं हैं की तुम ज़्यादा ज़ख़्मी न हो जाओ
मेरे तीर-ए-यादें बेक़ाबू निकल जाते हैं||

साक़ी का जाम अब बेसूद हो गया है
तेरा स्वाद-ए-मेहँदी से हम उछल जाते हैं||

मेरी ख़्वाबों में अक़सर फिरता रहो सनम
मेरी तनहा रातें दिन में बदल जाते हैं||   

Dilip

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