Monday, October 7, 2024

அகத்தின் ஆலயத்தில்


அன்பே! என் பெயரை அகத்தின் ஆலயத்தில்

அழகாய் எழுதிடு ஆழ்ந்த காதலால்

இன்பக் கீதமெல்லாம் இதயம் நிறைய

இசைக்கும் சிலம்பொலியில் ஏந்தி ஒலிக்கட்டும்


அரசி! உன் கோயில் அகன்ற முற்றத்தில்

அமரும் என் கிளியைக் காவல் காத்திடு

பரிவால் அணைத்திடு பாசம் பொங்கிட

பொன்னின் வளையலில் பூட்டு என் பரிசை


மலரின் மொட்டொன்றை மருவச் செய்வாய்

மணக்கும் கூந்தலிலே மறவா நினைவாய்

நிலவும் சிந்தூரம் நெற்றி அணியும்

நினைவாய் உன்னுடலின் நறுமணம் ஆகும்


உயிரின் இன்பமும் உடலின் துன்பமும்

ஒன்றாய்க் கலந்திட ஓங்கும் பேரன்பில்

தயங்கா நெஞ்சமே தழுவிக் கொள்ளடி

தனித்த என் உயிரை தாங்கும் தஞ்சமே 

Sunday, October 6, 2024

हमसे पूछिए

 दरिया से क्यूँ खफ़ा है नदी, हमसे पूछिए,

आँखों की शर्म की कहानी हमसे पूछिए।

गुलशन को छू न पाए सबा, ये तो जानिए,

हर फूल की जवानी हमसे पूछिए।


पायल की झंकार में राज़ है कोई,

ठुमरी की मस्तानी हमसे पूछिए।


साहिल पे मौज आए तो दिल धड़कता है,

ये इश्क की रवानी हमसे पूछिए।


बारिश में भीग जाए तो क्या होता है,

ये प्यार की कहानी हमसे पूछिए।


सितार-ए-दिल बजाकर गज़ल गाते हैं हम,

मोहब्बत की ज़ुबानी हमसे पूछिए।


'साहिल', तुम्हारी महफ़िल में क्या होता है,

हर शाम की शायरानी हमसे पूछिए।

फितरत-ए-इंसान की दास्तान

 फितरत-ए-इंसान की दास्तान सुनाता हूँ मैं, 

हर किरदार का इक बयान सुनाता हूँ मैं।

बिल्ली, बंदर, मगरमच्छ की आदत क्या है, 

सब इंसान में एक समान सुनाता हूँ मैं।


जन्म से मौत तलक की कहानी है अजब, 

जीते जी जुदा, मरते दरमियान, सुनाता हूँ मैं।


दिन-दहाड़े चोरों को शाही लिबास ढांपे, 

ग़रीब पर लगे इल्ज़ाम का ज्ञान सुनाता हूँ मैं।


ज़िंदगी का हिसाब न समझ पाए कोई, 

दौलत की तलाश में सरगर्दान, सुनाता हूँ मैं।


बाज़ार में झूठी कहानियाँ बिकती हैं, 

धोखे की दुनिया का अरमान सुनाता हूँ मैं।


'गामड़िया', क्या फ़ायदा अब कुछ कहने का, 

बस यही पुरानी पहचान सुनाता हूँ मैं।

हे मूर्ति, तू क्या है?

 हे मूर्ति, तू क्या है? कलाकार की आत्मा की अभिव्यक्ति

पत्थर से निकली तू, कवि के मन की अभिव्यक्ति। 

मंदिर तेरे लिए बना, भगवान ने मुझे बनाया

दोनों में है प्यार, यही है भक्ति की अभिव्यक्ति। 


मज़दूर की मेहनत से तू आकार पाती

उनके पसीने में है श्रम की अभिव्यक्ति। 


पहाड़ से तू आई, पत्थर से तराशी गई

प्रकृति और मानव के मिलन की अभिव्यक्ति। 


'गामड़िया' कहता है, मूर्ति में है जीवन का सार

हर छेनी का निशान है भावना की अभिव्यक्ति। 

दुनिया की सच्चाई

 


धरम और न्याय की बातें करते हैं, लेकिन क्या है सच्चाई

इतिहास गवाह है, पर कौन समझे इस दुनिया की सच्चाई। 

माँ का प्यार भुलाकर, अपने को वीर कहलाते हैं

छल-कपट में लिप्त, कहाँ है उनके दावों की सच्चाई। 


बेज़ुबान औरतों के जीवन में ज़हर घोलते हैं

कर्म और भाग्य का रोना रोते, कहाँ है उनकी सच्चाई। 


ईश्वर पर दोष मढ़ते हैं, अपनी गलती छिपाते हैं

मुँह पर एक, दिल में दूसरी, क्या है इनकी सच्चाई। 


इन बातूनी वीरों से सावधान रहना ज़रूरी है

आँख खुली रखनी होगी, तभी समझ पाएंगे सच्चाई। 


धोखे की दुनिया में एक दिन ऐसा भी आएगा

जब हर तरफ होगी केवल अच्छाई और सच्चाई। 

क़ब्र में एक पैग़ाम

सूरज ढले, गाँव सोए, क्या कहें हम ज़िंदगी की बात

खामोशी में गूँजती है मौत की सदियों पुरानी बात। 

पेड़ों की छाँव में सोते हैं वो जो कभी थे ज़िंदा

मिट्टी में मिल गए, अब क्या करें उनकी यादों की बात। 


गरीबी ने रोका उनको, न जाने क्या-क्या कर सकते थे

किसी में था राजा बनने का दम, किसी में कवि की बात। 


समंदर की गहराई में छिपे मोती की तरह थे वो

बिना देखे, बिना जाने चली गई उनकी अनकही बात।  


सादगी से जीए, चुपचाप चले गए इस दुनिया से

उनके नाम पत्थर पर लिखे, यही है उनकी आखिरी बात। 


कौन नहीं चाहता याद किया जाए उसे जाने के बाद

हर किसी के दिल में होती है अपनी पहचान की बात। 


प्रकृति की गोद में लेटे हुए, ख्व्वाबें  थीं उनकी दोस्त

कभी पेड़ के नीचे, कभी पहाड़ी पर, बस यही थी उनकी बात। 


एक दिन वो भी चले गए, जैसे सब चले जाते हैं

कब्र पर लिखा है उनका नाम, बस यही है आखिरी बात। 


ऐ 'गामडिया', तू भी एक दिन जाएगा इसी तरह

तेरी कविता में रहेगी तेरी और सबकी कहानी की बात। 

Saturday, October 5, 2024

न था अस्तित्व

न था अस्तित्व, न अनस्तित्व का लेश,

न आकाश था, न वायु का परिवेश।

किसने ढका था? किसकी थी शरण?

कहाँ था जल का अथाह गहन?


न मृत्यु थी, न अमरता का वास,

न दिन था, न रात का आभास।

एक तत्व श्वासहीन स्वयंभू,

उससे परे न कुछ और वस्तु।


आदि में तम से तम आच्छादित,

सब कुछ था जल में अप्रकाशित।

शून्य से वह एक उत्पन्न हुआ,

तप की महिमा से संजीवित हुआ।


काम ही था जो पहले उपजा,

मन का प्रथम बीज वही रचा।

सत्-असत् का बंधन ढूँढ़ा ज्ञानी,

हृदय में खोजा, बुद्धि से जानी।


फैली किरणें तिरछी सारी,

ऊपर क्या था, नीचे क्या भारी?

बीजधारी शक्तियाँ महान,

नीचे सामर्थ्य, ऊपर उत्थान।


कौन जाने, कौन कह सकता?

कहाँ से आई यह विश्व-रचना?

देव भी तो पीछे आए हैं,

कौन जाने कैसे बन पाए हैं?


यह सृष्टि कहाँ से उपजी है?

रची गई या स्वयं बनी है?

जो इसका स्वामी स्वर्ग में विराजे,

वही जाने, या वह भी न जाने।

வாழ்க்கை எனும் பயணம்

 வாழ்க்கை சொல்லும் கதையெல்லாம் நாளை மறந்திடுமே, வாழ்ந்த தடங்கள் நாமில்லாமல் மண்ணில் மறைந்திடுமே! கல்லாய் கால்கள் கனத்தாலும்  நின்று விடாதே, ...