Saturday, November 22, 2025

बुझती–बुझती पुकार की याद

वो बचपना, वो हवाओं में बिखरी महकती-सी रुत-ए-बहार की याद,

हर दिल को रोककर छू ले, वही मासूम-सी बुझती–बुझती पुकार की याद ||


वो दिन कि धूप भी हम पर लोरी-सी गिरती थी सकूँ भर-भर,

हर मोड़ पे मिलती थी ख़्वाबों की वो मासूम सी मुस्कान की याद ||


काग़ज़ के बस्तों में महफ़ूज़ रखा अपना छोटा-सा जहाँ,

हर पन्ने पर खिलता था आने वाले कल का कोई उद्गार की याद ||


साइकिल की साँसों में उड़ता था बचपन का सारा समंदर,

हर मोड़ पे रुककर हमको बुलाती थी वो शहर-ए-गुज़ार की याद ||


मनन कहता है—अब भी रूह में झिलमिल करती है रातों में,

आईनों में चेहरा अपना देख जगाती है कोई नन्हा-सा निखार की याद || 

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