Tuesday, April 23, 2019

प्यार का बक़ाया

बात-ए-दिल मैंने लबों तक़ लाया था
आँखें मिली, लो, सब कुछ गवाया था

फहराते पलकों का इशारा नाज़नीन था
लम्हें-ए-फ़िराक को वापस बुलाया था

दिल के कोने कोने में छान ज़रूर मारा
कुछ मिला, पर प्यार का एक साया था 

जो दिन में दे नहीं पायी, रात में दे गयी 
दिल कभी नहीं भरा, प्यार का बक़ाया था 


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