Monday, June 29, 2026

अभी भी है ।

 मेहँदी की वो ख़ुशबू दहलीज़ पे बाक़ी अभी भी है

तेरे जाने के बाद भी घर में तू राखी अभी भी है ।

वो तुलसी का बिरवा कँपता है उसी तरह अँगना में

तेरी साँसों की लय उसकी पत्ती-पत्ती में साखी अभी भी है ।


ओस ने जो चुभन दी थी जाई के फूलों को भोर में

वो मीठी तकलीफ़ मेरे सीने ने चाखी अभी भी है ।


हल्दी का वो पीलापन तेरे अंग-अंग पे जो था

उसकी रोशनी मेरी आँखों में आँखी अभी भी है ।


'मनन' घर तो वही है, दीवारें भी वही हैं —

बस वो नहीं जिसके बिना यह घर कहीं भी नहीं है ।

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