मेहँदी की वो ख़ुशबू दहलीज़ पे बाक़ी अभी भी है
तेरे जाने के बाद भी घर में तू राखी अभी भी है ।
वो तुलसी का बिरवा कँपता है उसी तरह अँगना में
तेरी साँसों की लय उसकी पत्ती-पत्ती में साखी अभी भी है ।
ओस ने जो चुभन दी थी जाई के फूलों को भोर में
वो मीठी तकलीफ़ मेरे सीने ने चाखी अभी भी है ।
हल्दी का वो पीलापन तेरे अंग-अंग पे जो था
उसकी रोशनी मेरी आँखों में आँखी अभी भी है ।
'मनन' घर तो वही है, दीवारें भी वही हैं —
बस वो नहीं जिसके बिना यह घर कहीं भी नहीं है ।
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