मैं सितार हूँ, मेरी हर धड़कन का तार तू ही है
जो बजाए, जो गाए, जो सुने — वो सरकार तू ही है ।
मैंने सोचा था मैं अलग हूँ, तू अलग है —
पर जब झनझनाई सितार , समझा — इक़रार तू ही है ।
बरसों तक मैं ढूँढता रहा तुझे मंदिर मंदिर —
अब जाना — मेरे भीतर खिलती जो बहार, तू ही है ।
तार बिन सितार क्या, सितार बिन तार क्या —
यह जो मिलन है, यह जो इंतज़ार — तू ही है ।
जिस पल छुआ तूने — मैं राग बन गया —
मेरे हर सुर का, हर स्वर का आधार तू ही है ।
'मनन' समझा आख़िर — न मैं था, न तू था —
बस एक नग़्मा था — उस नग़्मे का मेदार तू ही है ।
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