किसी की सरहदों से बंध के मत रह, दिल मेरे — बेघर हो जा
वो जो है सबमें, उसमें खो के अपना घर हो जा ।
जहाँ से आई थी वो रोशनी, उसी का हिस्सा बन
किसी से डर के मत रुक, आत्मा — निडर हो जा ।
न जाति, न मज़हब, न देश की हो कोई ज़ंजीर तुझ पे
इन सब दीवारों से ऊपर उठ, बेअसर हो जा ।
जो नाम दिया तुझे दुनिया ने, वो भी एक क़फ़स था
उस पर्दे को हटा, 'मनन' — बेख़बर हो जा ।
ये कायनात पुकारे तुझको "हे बेघर बंदे !"
बस एक ही नग़्मा बन, सबका हमसफ़र हो जा ।
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