Monday, June 29, 2026

इंसान रह ।

 चाहे जहाँ हो, जैसे भी हो — बस इंसान रह

ये एक शर्त है ज़िंदगी की, बस इंसान रह ।

मंदिर हो या मस्जिद हो, गिरजा हो या गुरुद्वारा —
दरवाज़े सब अलग हैं, मगर तू यहाँ इंसान रह ।

जाति के धागे, देश की दीवारें, मज़हब के पहरे —
इन सब आगों में जल के भी वहाँ इंसान रह ।

दुनिया पूछेगी — तू कौन है, किसका है, क्या है? —
इन सवालों की आँच में पिघल, कहाँ इंसान रह ।

ये जो नफ़रत है, ये जो बँटवारा है, ये जो धुआँ है —
इस अँधेरे को चीर के निकल, धुएँ में इंसान रह ।

'मनन' कहता है — नाम मिटे, पहचान मिटे, सब मिटे —
पर जब तक साँस है, जब तक हो जवाँ — इंसान रह ।

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