Monday, June 29, 2026

बढ़ता जा

 साहिल छोड़ दे ऐ दिल — बहने का इशारा बढ़ता जा

दरिया ख़ुद बुलाता है — उसी का किनारा बढ़ता जा ।

जिन हाथों ने थामा था — वो घाट पीछे रह गए

मत माँग अब पलट के किसी का सहारा — बढ़ता जा ।


पत्थर भी रास्ता देते हैं जब पानी ज़िद पे हो

उन्हीं दरारों में है तेरा भी नज़ारा — बढ़ता जा ।


टूटेगी कश्ती, थपेड़े भी खाएगी मौजों में

हर शिकस्त के बाद मिलता है दोबारा — बढ़ता जा ।


ये जो बहाव है, ये जो रवानी है — यही तू है

कश्ती नहीं तू — दरिया ही है तेरा गुज़ारा — बढ़ता जा ।


'मनन' ने जाना — न कश्ती थी, न दरिया था

बस एक मौज थी — जिसका न छोर न किनारा — बढ़ता जा ।

No comments:

From a Professional Platform to a Pimping Platform

  There was a time — not even that long ago — when LinkedIn meant something. It was the one corner of the internet where you could reasonabl...