साहिल छोड़ दे ऐ दिल — बहने का इशारा बढ़ता जा
दरिया ख़ुद बुलाता है — उसी का किनारा बढ़ता जा ।
जिन हाथों ने थामा था — वो घाट पीछे रह गए
मत माँग अब पलट के किसी का सहारा — बढ़ता जा ।
पत्थर भी रास्ता देते हैं जब पानी ज़िद पे हो
उन्हीं दरारों में है तेरा भी नज़ारा — बढ़ता जा ।
टूटेगी कश्ती, थपेड़े भी खाएगी मौजों में
हर शिकस्त के बाद मिलता है दोबारा — बढ़ता जा ।
ये जो बहाव है, ये जो रवानी है — यही तू है
कश्ती नहीं तू — दरिया ही है तेरा गुज़ारा — बढ़ता जा ।
'मनन' ने जाना — न कश्ती थी, न दरिया था
बस एक मौज थी — जिसका न छोर न किनारा — बढ़ता जा ।
No comments:
Post a Comment