चमन में आज फिर कोयल की भीनी सी सदा सुनाई दे रही है
हर इक शाख़ के होंठों पे बसी इक नवा सुनाई दे रही है।
बरस बीते थे जिस ख़ामोशी में, वो कली अब चटक उठी है
उसी के लफ़्ज़-लफ़्ज़ से उठती नई हवा सुनाई दे रही है।
ये पत्ता-पत्ता, ये ज़र्रा-ज़र्रा उसी इक धुन में डूब के झूमे
हर इक धड़कते दिल के अंदर वही दुआ सुनाई दे रही है।
उठो कि सहर पुकारती है हर सोई हुई-सी रूह को अब
ज़मीं से आसमाँ तलक इक जगाती सबा सुनाई दे रही है।
‘मनन’ ये सारी कायनात इक ही नग़्मे में जैसे ढलती जाए
तेरी आवाज़ में मुझको ख़ुदा की इक नदा सुनाई दे रही है।
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