Monday, June 29, 2026

कोयल

 चमन में आज फिर कोयल की भीनी सी सदा सुनाई दे रही है

हर इक शाख़ के होंठों पे बसी इक नवा सुनाई दे रही है।

बरस बीते थे जिस ख़ामोशी में, वो कली अब चटक उठी है

उसी के लफ़्ज़-लफ़्ज़ से उठती नई हवा सुनाई दे रही है।


ये पत्ता-पत्ता, ये ज़र्रा-ज़र्रा उसी इक धुन में डूब के झूमे

हर इक धड़कते दिल के अंदर वही दुआ सुनाई दे रही है।


उठो कि सहर पुकारती है हर सोई हुई-सी रूह को अब

ज़मीं से आसमाँ तलक इक जगाती सबा सुनाई दे रही है।


‘मनन’ ये सारी कायनात इक ही नग़्मे में जैसे ढलती जाए

तेरी आवाज़ में मुझको ख़ुदा की इक नदा सुनाई दे रही है।


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